‘हाड़ा’ विकास सिंह
सिद्धार्थनगर : उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिला अंतर्गत के ढेबरुआ थाना क्षेत्र के दुधवनिया बुजुर्ग गांव में एक प्रतिष्ठित परिवार में 10 जनवरी 1918 को जन्मे मौलाना अब्दुल कय्यूम रहमानी ना तब पहचान के मोहताज थे ना अभी हैं। देश की आजादी की लड़ाई में शामिल होने के साथ इस्लामिक शिक्षा जगत में मध्यपूर्व के देशों में भी उनका जाना पहचाना नाम है। वह देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के करीबियों में से एक थे और कई सारे मुद्दों पर उनकी राय ली जाती थी।
देवरिया का मूल निवासी है मौलाना का परिवार
मौलाना अब्दुल कय्यूम रहमानी के परिवार मझौली राज्य देवरिया महाराजा बौद्धमल थे। बिसेन वाटिका सन् 1887, खड़क बहादुर मल बिसेन ने बौद्धमल का उल्लेख मझौली के 104वें राजा के रुप में किया है, जिन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर अपना नाम मोहम्मद सलीम रखा था। उन्हीं के नाम से देवरिया में सलेमपुर कस्बा एवं रेलवे स्टेशन मौजूद है।
मौलाना अब्दुल कय्यूम का प्रारंभिक जीवन
अब्दुल कय्यूम गांव के परिषदीय स्कूल से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली चले गए थे। वह दौर था जब अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई चल रही थी। दिल्ली के रहमानिया स्कूल से इस्लामिक स्टडीज की उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद वह आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। उनकी दिल्ली में बड़े-बड़े आंदोलनकारियों से अच्छी खासी जान पहचान थी। पंडित नेहरु से अक्सर मुलाकात भी हो जाया करती थी। वर्ष 1942 में अपने गांव लौटे और आजादी की जंग को आगे बढ़ाने की तैयारी में जुटे हुए थे। तैयारी का कुछ दिन ही गुजरा था तभी उन्हें 22 मार्च 1942 को गिरफ्तार कर बस्ती जेल में रखा गया। बस्ती जेल से गोरखपुर फिर इलाहाबाद नैनी जेल में 22 अगस्त 1942 से 22 मई 1943 तक नजरबंद रखा गया। जिस बैरक में मौलाना को नौ महीने तक नजरबंद किया गया था, उसमें लाल बहादुर शास्त्री, फिरोज गांधी, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, पंडित सुंदर लाल, मुजफ्फर हुसैन, डॉ. कैलाश नाथ काटजू, पुरुषोत्तम दास टंडन, विश्वम्भर दयालु त्रिपाठी, पंडित कमला पति त्रिपाठी आदि जैसे कई बड़े आंदोलनकारी नजरबंद थे।
विदेशों में तकरीर करने जाते थे मौलाना
नौ महीने जेल में रहने के बाद अब्दुल कय्यूम को रिहा किया गया। जेल से छूटने का बाद वे फिर आज़ादी की लड़ाई में कूद गए। देश आज़ाद हुआ तो अब्दुल कय्यूम समाजसेवा में जुट गए। अपने क्षेत्र के बढ़नी बाज़ार में ‘गांधी आदर्श विद्यालय इंटर कॉलेज’ की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया, बाद में इसके प्रबंधक बने।महात्मा गांधी के एक पत्र में बस्ती जिले के दो स्वतंत्रता सेनानियों का जिक्र है जिनमें से एक अब्दुल कय्यूम का नाम है। (पत्र राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली में सुरक्षित है) अरबी भाषा के विद्वान और इस्लाम के गहरे जानकार अब्दुल कय्यूम को बाद में मौलाना अब्दुल कय्यूम रहमानी के नाम से शोहरत मिली। उन्हें कुवैत और सऊदी अरब तक तकरीर करने बुलाया जाता था।
मौलाना अब्दुल कय्यूम नेहरु के थे करीबी
मौलाना अब्दुल कय्यूम देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के करीबियों में शामिल थे। वर्ष 1952 में जब पहली एशियन रिलेशनशिप कॉन्फ्रेंस हुई, तब पंडित नेहरु ने मौलाना को भी आमंत्रित किया था। मौलाना अब्दुल कय्यूम की मृत्यु 28 मई 2008 को हुई। स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अब्दुल कय्यूम रहमानी के पुत्र बदरे आलम कहते हैं कि पिता के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने पर उन्हें और उनके परिवार को गर्व है। उन्होंने देश की आजादी की लड़ाई लड़ने के साथ शिक्षा का भी अलख जगाने के काम किया। उनके नाम पर मौलाना अब्दुल कयूम रहमानी ट्रस्ट स्थापित है।




