‘हाड़ा’ विकास सिंह
काठमांडू : नेपाल सरकार ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवादों का समाधान केवल कूटनीतिक संवाद और वार्ता के माध्यम से ही संभव है। राष्ट्रपति रामचंद्र पौड़ेल द्वारा संघीय संसद में प्रस्तुत आर्थिक वर्ष 2083/84 की नीति एवं कार्यक्रम में सीमा विवादों को संवाद के जरिए सुलझाने की प्रतिबद्धता दोहराई गई।
सरकार की ओर से यह संदेश ऐसे समय में आया है, जब हाल ही में लिपुलेख पास मुद्दे को लेकर नेपाल ने भारत और चीन को कूटनीतिक नोट भेजा था। सरकार ने 4 मई को दोनों देशों को पत्राचार करते हुए नेपाल की आपत्ति दर्ज कराई थी।
नीति एवं कार्यक्रम में कहा गया है कि नेपाल अपनी संप्रभुता, भौगोलिक अखंडता और राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए संतुलित कूटनीति अपनाएगा। साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर, गुटनिरपेक्षता और पंचशील के सिद्धांतों के आधार पर पड़ोसी एवं मित्र देशों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाया जाएगा।
राष्ट्रपति पौडेल ने संसद में कहा कि सीमा विवादों का समाधान ‘कूटनीतिक संवाद’ के माध्यम से खोजा जाएगा। जानकारों का मानना है कि सरकार का यह बयान भारत और चीन के साथ हालिया घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण संदेश देता है। हाल के दिनों में भारत और नेपाल के संबंधों में हल्की दूरी की चर्चा भी तेज हुई है।
दरअसल, भारत और चीन द्वारा लिपुलेख मार्ग से तीर्थयात्रियों की आवाजाही की घोषणा के बाद नेपाल ने कड़ा रुख अपनाते हुए कूटनीतिक नोट जारी किया था। नेपाल के इस कदम पर भारत के विदेश मंत्रालय ने प्रतिक्रिया दी, जबकि चीन की ओर से अब तक कोई सार्वजनिक टिप्पणी सामने नहीं आई है।
भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत नीलांबर आचार्य का कहना है कि विवाद की शुरुआत पड़ोसी देशों की ओर से हुई और नेपाल ने केवल अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए प्रतिक्रिया दी। नेपाल लगातार 1816 की सुगौली संधि के आधार पर लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख क्षेत्र पर अपना दावा करता रहा है।
गौरतलब है कि वर्ष 2077 में नेपाल सरकार ने लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को शामिल करते हुए नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था। इससे पहले भारत के सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा जारी नक्शे में इन क्षेत्रों को भारतीय सीमा के भीतर दिखाया गया था, जिस पर नेपाल ने कई बार कूटनीतिक विरोध दर्ज कराया था।विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा विवाद कोई नया मुद्दा नहीं है और इसके समाधान में समय लग सकता है।
हालांकि, नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री कमल थापा का कहना है कि सीमा विवाद को लेकर पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्रभावित नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि निरंतर कूटनीतिक पहल और संवाद ही समाधान का रास्ता है। नीति एवं कार्यक्रम में नेपाल ने बहुआयामी विदेश नीति पर भी जोर दिया है।
सरकार ने पारंपरिक कूटनीति को आर्थिक कूटनीति में बदलते हुए पर्यटन, ऊर्जा, सूचना प्रौद्योगिकी और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में विदेशी निवेश आकर्षित करने की योजना का उल्लेख किया है। हालांकि, भारत के साथ पंचेश्वर बहुउद्देश्यीय परियोजना और चीन के साथ पारवहन संधि जैसे अहम मुद्दों का नीति एवं कार्यक्रम में विशेष उल्लेख नहीं किया गया है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि भारत के विदेश सचिव विक्रम मिश्री का प्रस्तावित नेपाल दौरा स्थगित हुआ है, तो दोनों देशों को संवाद और उच्चस्तरीय मुलाकातों का माहौल बनाए रखने के लिए प्रयास करना चाहिए।
पूर्व राजदूत नीलांबर आचार्य ने कहा कि संवाद और कूटनीतिक मुलाकातें लगातार जारी रहनी चाहिए। उनके अनुसार, सरकार की नई नीति एवं कार्यक्रम यह स्पष्ट संदेश देती है कि नेपाल बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहता है और वह संतुलित एवं व्यावहारिक कूटनीति के पक्ष में है।




